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From Justice Definitions Project

अप्रूवर क्या है

ब्लैक लॉ डिक्शनरी (ब्लैक का कानून शब्दकोश) "अप्रूवर" को एक अपराध के सहयोगी के रूप में परिभाषित करती है जो उसी अपराध के लिए दूसरों पर आरोप लगाता है और अदालत के फैसलेपर अपने दोषी साथियों के खिलाफ गवाही देने के लिए गवाह के रूप में स्वीकार किया जाता है।[1] "अप्रूवर" शब्द आपराधिक प्रक्रिया संहिता में न तो परिभाषित किया गया है और न ही इसमें इसका प्रयोग किया गया है। लेकिन यह आम तौर पर ऐसे व्यक्ति पर लागू होता है, जिसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपराध में शामिल या जानकार माना जाता है, जिसे संहिता की धारा  ३३७ के तहत अपराध में शामिल अन्य व्यक्तियों के खिलाफ उसकी गवाही प्राप्त करने के उद्देश्य से क्षमादान दिया जाता है।[1]

अप्रूवर सहयोगी और सह-आरोपी दोनों से अलग शब्द है। सहयोगी का अर्थ है एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपराध करने में हिस्सा लिया है, जब एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किया जाता है और इसके आयोजन में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक सहयोगी होता है। सह-आरोपी एक ऐसे व्यक्ति  का वर्णन करता है जो एक आपराधिक मामले में एक या अधिक अन्य लोगों के साथ आरोपित है।  वे एक साथ एक दंडनीय अपराध या जुर्म करने में आरोपी माने जाते है। प्रत्येक सह-आरोपी को अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना जाता है, और उनका मुकदमा एक साथ चलता है, हालांकि उनकी भागीदारी और दोष  की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।[2]

अप्रूवर से संबंधित कानूनी प्रावधान

सी.आर.पी.सी. और बी.एन.एस.एस. के तहत प्रावधान

धारा  ३०६ , सी.आर.पी.सी. (धारा ३४३  , बी.एन.एस.एस. २०२३):आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा  ३०६ न्यायिक अधिकारियों, जिसमें मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, महानगर मजिस्ट्रेट और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट शामिल हैं, को कुछ शर्तों के तहत किसी अपराध में शामिल व्यक्ति को क्षमादान देने की अनुमति देती है। इन शर्तों में अपराध से संबंधित जानकारी और दूसरों की भागीदारी का पूर्ण खुलासा करना शामिल है, चाहे वह मुख्य या सहायक के रूप में हो। यह धारा विशेष रूप से सत्र न्यायालय या विशेष न्यायाधीश द्वारा विचारणीय अपराधों, या सात वर्ष या उससे अधिक की कैद से दंडनीय अपराधों पर लागू होती है। मजिस्ट्रेट को क्षमादान देने के कारणों और क्या यह स्वीकार किया गया था, इसका रिकॉर्ड रखना होगा, और अनुरोध पर आरोपी को इस रिकॉर्ड की एक प्रति प्रदान करनी होगी। क्षमादान स्वीकार करने वाले व्यक्तियों को अदालत में गवाही देनी होगी और मुकदमे के समाप्त होने तक उन्हें हिरासत में रखा जा सकता है। एक बार स्वीकार किए जाने के बाद, अपराध  का प्ररूपऔर अदालत के अधिकार क्षेत्र के आधार पर, मामले को बिना किसी आगे की जांच के विचारण के लिए  सौंपा जा सकता है।

धारा ३०७ , सी.आर.पी.सी. (धारा ३४४  , बी.एन.एस.एस.२०२३  )

क्षमादान की पेशकश का निर्देश देने की शक्ति - मामले के प्रतिबद्ध होने के बाद किसी भी समय, निर्णय  लिए जाने से पहले, वह न्यायालय जिसके  तहत प्रतिबद्धता की गई है, विचारण में किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से, जो प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी ऐसे अपराध में संबद्ध या उसका जानकार समझा जाता है, उसी शर्त पर ऐसे व्यक्ति को क्षमादान की पेशकश कर सकता है।

धारा ३०८, सी.आर.पी.सी. (धारा ३४५ , बी.एन.एस.एस. २०२३  )

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा ३०८  में  उन व्यक्तियों के लिए मुकदमें के नियम हैं  को  जो धारा ३०६ या धारा ३०७ के तहत दिए गए क्षमादान की शर्तों का पालन नहीं कर पाते।। यदि लोक अभियोजक यह  सिद्ध करता है कि व्यक्ति ने जानबूझकर आवश्यक जानकारी छिपाई है या झूठा साक्ष्य दिया है, तो उन्हें मूल अपराध और किसी भी संबंधित अपराध के लिए विचारण किया जा सकता है। हालांकि, उनका मुकदमा  बाकी  आरोपी व्यक्तियों के साथ एकत्र   नहीं किया जा सकता है, और झूठा साक्ष्य देने के लिए अभियोजन को उच्च न्यायालय की मंजूरी की आवश्यकता होती है। क्षमादान स्वीकार करने वाले व्यक्ति द्वारा दिया गया कोई भी बयान, जो धरा ३०६ के तहत मजिस्ट्रेट या धरा 3०६ (४) के अधीन न्यायलय ने दर्ज किया हो, मुकदमे  में उनके खिलाफ साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। आरोपी को क्षमादान की शर्तों के अनुपालन का अधिकार है, जिससे सबूत का भार अभियोजन पक्ष पर सौंपा जाता है। अदालत को विचारण आगे बढ़ाने से पहले इस सफाई  के बारे में पूछताछ करनी होगी। यदि आरोपी अनुपालन साबित कर देता है, तो अदालत को संहिता में अन्य प्रावधानों के बावजूद उन्हें बरी करना होगा।

धारा ३०९ , सी.आर.पी.सी. (धारा ३४६, बी.एन.एस.एस. २०२३ )

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा ३०९  अदालती कार्यवाही को स्थगित करने या सम्पाप्त करने की प्रक्रियाओं को निर्धारित करती है। आम तौर पर , विशेष परिस्थितियों को छोड़कर जिनमें रोकने की आवश्यकता होती है, सभी गवाहों की जांच पूरी होने तक कार्यवाही प्रतिदिन जारी रहनी चाहिए। धारा में दिए गए  कुछ गंभीर अपराधों के मामलों में, आरोप पत्र दाखिल करने की तारीख से दो महीने के भीतर कार्यवाही पूरी की जानी चाहिए। अदालत के पास उचित कारणों से कार्यवाही को स्थगित करने या रोकने का अधिकार है, जिसके कारण दर्ज किए जाते हैं, और यदि आवश्यक हो तो आरोपी को रिमांड पर भेज सकती है, लेकिन एक बार में पंद्रह दिन से अधिक नहीं। दर्ज किए गए विशेष कारणों के बिना उपस्थित गवाहों की जांच किए बिना स्थगन या  समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त,आरोपी को प्रस्तावित सजा को चुनौती देने के मौके   के लिए स्थगन नहीं किया जा सकता है। पक्षकार अपने काबू में होने वाले   कारणों से स्थगन की मांग  नहीं कर सकते हैं, जैसे किसी अन्य अदालत में उनके वकील की अनुपलब्धता। यदि कोई गवाह उपस्थित है लेकिन पक्षकार या वकील अनुपस्थित है या तैयार नहीं है, तो अदालत गवाह का बयान दर्ज कर सकती है और उसके अनुसार   आगे बढ़ सकती है।यह धारा यह भी स्पष्ट करती है कि रिमांड के माध्यम से अतिरिक्त साक्ष्य प्राप्त करना इसका एक उचित कारण है और रोकने  या स्थगित करने की मंजूरी के लिए संभावित शर्तों को पेश  करती है, जिसमें मूल्य संबंधित उलझाव  भी शामिल हैं।

धारा ३३७ , सी.आर.पी.सी. (धारा ३७६ , बी.एन.एस.एस. २०२३ )

ऐसी प्रक्रिया जहां मानसिक रूप से अस्थिर कैदी अपनी सफाई देने में  सक्षम बताया जाता है - यदि ऐसा व्यक्ति धारा ३३०  की उपधारा (२ ) के प्रावधानों के तहत नजरबंद है, और जेल में नजरबंद व्यक्ति के मामले में, जेल का महानिरीक्षक, या पागलखाने में नजरबंद व्यक्ति के मामले में, ऐसे पागलखाने में मिलने आया हुआ व्यक्ति , या उनमें से कोई दो यह प्रमाणित करें कि, उनकी या उन दोनों की राय में, ऐसा व्यक्ति अपनी सफाई देने के काबिल   है, तो उसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय के आगे, जैसा भी मामला हो, ऐसे समय पर पेश किया जाएगा जैसा मजिस्ट्रेट या न्यायालय तय करे , और मजिस्ट्रेट या न्यायालय धारा ३३२  के प्रावधानों के तहत ऐसे व्यक्ति से निपटेगा; और महानिरीक्षक या मिलने आए हुए व्यक्तियों का प्रमाण पत्र साक्ष्य के रूप में स्वीकार  होगा।

टिपण्णी: बी एन इस इस की धारा ३७६ के तहत "पागल" की जगह "अस्वस्थ मन” (अस्थिर मानसिक संतुलन) का उपयोग किया गया है और, जो मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, २०१७ के अधीन मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड का निर्देशन लिया गया है

एक ही अपराध के लिए संयुक्त विचारण के अधीन व्यक्ति और अन्य लोगों को प्रभावित करने वाले अप्रूवर क्या है

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रावधान

धारा ३० (धारा १४, बी.एस.बी. २०२३)

एक ही अपराध के लिए संयुक्त विचारण के तहत स्वीकृति करने वाले व्यक्ति और अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करने वाली सिद्ध स्वीकृति पर विचार—जब एक से अधिक व्यक्तियों का एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारण किया जा रहा हो, और ऐसे व्यक्तियों में से एक द्वारा की गई स्वीकृति जो स्वयं को और ऐसे अन्य व्यक्तियों में से कुछ को प्रभावित करती हो, सिद्ध हो जाती है, तो न्यायालय ऐसी स्वीकृति पर ऐसे अन्य व्यक्ति के विरुद्ध भी विचार कर सकता है और स्वीकृति करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध भी विचार कर सकता है।

धारा ११४  (धारा ११९ , बी.एस.बी. २०२३  )

अधिनियम की धारा ११४ उन तथ्यों से संबंधित है जिन पर न्यायालय किसी विशेष मामले में अनुमान लगा सकता है, और दृष्टांत (बी) में कहा गया है कि एक सहयोगी एक ऐसा व्यक्ति है जो विश्वसनीय नहीं माना जाता है जब तक कि अप्रूवर द्वारा दिए गए साक्ष्य किसी अन्य साक्ष्य से नहींमिलाई  जाती है।

धारा १३३  (धारा १३८ , बी.एस.बी. 2023)

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२  की धारा १३३ यह स्थापित करती है कि एक सहयोगी अपने सह-आरोपी के खिलाफ एक सक्षम गवाह है और उनकी गवाही अदालत में स्वीकार्य है। इसके अलावा, एक दोषसिद्धि केवल इसलिए गैरकानूनी नहीं है क्योंकि यह गवाही दूरसे कोई साक्ष्य से मिलाई नहीं गई है। । हालांकि, यह एक लंबे समय से स्थापित कानूनी प्रथा है कि धारा १३३ को साक्ष्य अधिनियम की धारा ११४  के दृष्टांत (बी) के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

अप्रूवर पर मामले कानून:

रविंदर सिंह विरुद्ध हरियाणा राज्य, १९७५  क्रि. एल.जे. ७६५   पृष्ठ ७६९, ७७० (एस.सी.): ए.आई.आर. १९७५ एस.सी. ८५६

  1. एक अप्रूवर एक सबसे अयोग्य मित्र है, अगर है भी तो , और उसे अपनी प्रतिरक्षा के लिए सौदेबाजी करने के बाद, अदालत में अपना श्रेय साबित करना चाहिए। यह परीक्षण पहले तब पूरा होता है जब उसके द्वारा बताई गई कहानी उसे अपराध में शामिल करती है और घटनाओं के क्रम भरोसा दिलाने वाले औरसच्चे लगे। । कहानी, यदि वास्तविकता के साथ विस्तार में बारीकी से बताई जाए तो इसे तुरंत खारिज होने से बचाने की संभावना है। दूसरा, एक बार वह बाधा पार हो जाने के बाद, एक अप्रूवर द्वारा दी गई कहानी, जहां तकआरोपी का संबंध है, उसे इस तरह से शामिल करनी चाहिए जिससे संदेह से परे दोष सिद्ध हो जाए।। एक दुर्लभ मामले में, किसी विशेष मामले पर असर करने वाले   सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, एक अप्रूवर के असमर्थित साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि हो सकती है अगर वो अदालत ने विश्वसनीय और भरोसेमंद माना है। हालांकि आम तौर पर, एक अप्रूवर के बयान को भौतिक रूप से सिद्ध करना चाहिए   जो अपराध और अपराधी के बीच की दूरी को करीब से जोड़ता हो। अगर एक अप्रूवर द्वारा बताए हुए   कुछ निश्चित  पहलू, जो सीधे एक आरोपी से संबंधित हों, दूसरे भरोसेमंद गवाही से मिलते हो,   तो उसकी गवाही पर भी भरोसा किया जा सकता है, और उसके आधार पर दोषसिद्धि आधारित हो सकती है।

तारिक अहमद दर   विरुद्ध राष्ट्रीय जांच एजेंसी, 2023 एस.सी.सी. ऑनलाइन जम्मू और कश्मीर  २३६ सी.आर.पी.सी. की धारा ३०६ (४)(बी)

  1. में दिए  प्रावधान यह अनिवार्य करते हैं कि जब तक आरोपी पहले से जमानत पर नहीं है, उसे विचारण की समाप्ति तक हिरासत में रखा जाएगा जो आपराधिक न्यायालय की अप्रूवर को जमानत पर रिहा करने की शक्तियों पर काबू लाता है, , हालांकि, उच्च न्यायालय के पास सी.आर.पी.सी. की धारा ४८२   के तहत ये अधिकार हैं जिनसे  न्याय के हित में और अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए याचिकाकर्ता/अप्रूवर को जमानत पर रिहा करने के आदेश दे सकते हैं। ।
3.शंकर विरुद्ध  तमिलनाडु राज्य शंकर, १९९४  एस.सी.सी.  (४) ४७८

'सहयोगी' शब्द को साक्ष्य अधिनियम द्वारा परिभाषित नहीं किया गया है और आम तौर पर यह समझा जाता है कि सहयोगी का अर्थ अपराध में दोषी साथी या भागीदार है। एक सहयोगी अप्रूवर बनकर अभियोजन का गवाह बन जाता है।

4.अन्य मामले

कानूनी प्रावधानों और न्यायिक पूर्व निर्णयों के आधार पर, विशेष रूप से सी.बी.आई. विरुद्ध अशोक कुमार अग्रवाल और अन्य; जसबीर सिंह विरुद्ध विपिन कुमार जागी और अन्य; प्रभजोत रंजन सरकार और अन्य विरुद्ध बिहार राज्य; उत्तर प्रदेश राज्य विरुद्ध  कैलाश नाथ अग्रवाल और अन्य; एम.एम. कोचर विरुद्ध  राज्य; और रणधीर बसु विरुद्ध पश्चिम बंगाल राज्य, निम्नलिखित कानूनी सिद्धांत स्थापित किए गए हैं:[2][3]

  1. अदालत की माफी देने की  शक्ति का उद्देश्य ऐसे साक्ष्य प्राप्त करना होना चाहिए जो अपराध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित हो।
  2. उचित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत किसी भी चरण में माफी दे सकती है। पर ऐसा करने से पहले, अदालत को यह समझना चाहिए कि माफी मांगने वाला व्यक्ति को किस प्रकार का साक्ष्य देने की आवश्यकता है , साथ ही अपराध में उनकी भागीदारी और भूमिका क्या है।
  3. यदि अभियोजन पक्ष का मानना है कि अप्रूवर की गवाही के बिना अन्य अपराधियों की दोषसिद्धि चुनौतीपूर्ण होगी, तो अदालत को बेशक माफी बयान करनी चाहिए।
  4. अदालत किसी आरोपी व्यक्ति के अप्रूवर के रूप में सेवा करने के प्रस्ताव पर विचार कर सकती है, हालांकि आमतौर पर अभियोजन पक्ष पहले ये मांग  करता है।
  5. अदालत को यह अधिकार  मुख्य रूप से तब प्रयोग करना चाहिए जब अभियोजन पक्ष मांग को मानता है , क्योंकि राज्य को अप्रूवर की गवाही की आवश्यकता नहीं हो सकती है और वह एक ऐसे आरोपी को माफ नहीं करना चाह सकता है जो मुख्य अपराधी हो सकता है।
  6. माफी अपराध से संबंधित सभी घटनाओं के पूर्ण और  सच्चे खुलासे से हीहोती है, जिसमें बारीक वर्णन   हैं। ऐसा न कर पाने पर  सी.आर.पी.सी. की धारा ३०८  के तहत अलग कानूनी कार्यवाही शुरू करनी होगी।
  7. एक बार प्रतिरक्षा दिए जाने और अप्रूवर के रूप में नामित किए जाने के बाद, व्यक्ति को छोड़ दिया जाता है, वह आरोपी नहीं रहता है, और उससे  सह-आरोपी द्वारा केवल गवाह के रूप में पूछताछ की जा सकती है, जब तक कि पूरी सच्चाई का खुलासा न करने के कारण प्रतिरक्षा रद्द नहीं कर दी जाती।


सन्दर्भ

  1. https://highcourtchd.gov.in/sub_pages/top_menu/about/events_files/chap14.pdf
  2. Bar and Bench